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परम पूज्य गुरुदेव 1008 श्री टेकचंद जी महाराज

त्याग, भक्ति और ज्ञान की अविस्मरणीय गाथा

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भारतवर्ष, संतों और सत्पुरुषों की भूमि, जहाँ समय-समय पर ऐसे महान व्यक्तित्वों का अवतरण होता रहा है जिन्होंने भारतीय संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखा। इसी श्रृंखला में परम पूज्य गुरुदेव 1008 श्री टेकचंद जी महाराज का अवतरण हुआ, जिनके जीवन में संत श्री कबीर दास जी एवं वैष्णव भक्ति का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।

प्रारंभिक जीवन और जन्मभूमि

"गृह त्याग: सत्य के पथ की ओर"

            पिताजी की तबीयत नरम होने पर उन्होंने कारोबार तीनों पुत्रों—अमीचंद, तुलसीराम और टेकचंद—को सौंपा। एक बार बाजार से लौटते समय, श्री टेकचंद जी को रास्ते में साधु-संतों की एक टोली मिली। उनकी भक्ति से प्रभावित होकर, उन्होंने अपनी सारी रकम संतों की सेवा में खर्च कर दी और खाली हाथ घर लौट आए।

             जब अन्य व्यापारियों ने पिता श्री उदयराम जी से इसकी शिकायत की, तो क्रोधित होकर पिताजी ने श्री टेकचंद जी को सबके सामने अपमानित किया और कहा: “अभी चले जाओ मेरे सामने से! जहाँ तुम जाना चाहो जा सकते हो! अब तुम मेरे घर में पैर मत रखना!”

पिता के मुख से ये कठोर शब्द सुनकर उनके कोमल हृदय को गहरा आघात पहुँचा। उन्होंने तुरंत समझ लिया कि

इस नश्वर संसार में ईश्वर के बिना कोई मददगार नहीं है।

           विक्रम संवत 1823 (सन 1766) में, मात्र 18 वर्ष की आयु में, उन्होंने पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर घर छोड़ दिया। घर से निकलने के पश्चात् वे रात-दिन प्रभु के चरणों को हृदय में धारण कर गाँव-गाँव घूमते हुए भजन और ज्ञान के सागर में तैरने लगे।

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उन्हेल में गुरु-प्राप्ति

वि.सं. 1824 में गुरु परसराम जी से दीक्षा ली और 12 वर्ष सेवा की।

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आश्रम का त्याग

गुरु भाइयों में द्वेष न हो, इसलिए चुपचाप आश्रम छोड़कर निकल पड़े।

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चार धाम यात्रा

6 वर्षों तक भारत भ्रमण, बद्रीनाथ, जगन्नाथ, और रामेश्वरम की यात्रा।

गृहस्थ में मुक्ति का मार्ग

जिस प्रकार कमल पर जल डालने से कमल का पत्ता गीला नहीं होता, वरन जल को नीचे गिरा देता है, उसी प्रकार गृहस्थ में रहकर भी मनुष्य मुक्ति को प्राप्त कर सकता है।

प्रमुख चमत्कार और घटनाएं

अविस्मरणीय विरासत

गुरुदेव 1008 श्री टेकचंद जी महाराज का जीवन त्याग, निर्भयता और जन कल्याण का अद्भुत उदाहरण है। उनके उपदेशों और चमत्कारों ने भारतीय संस्कृति, साहित्य और इतिहास को समृद्ध किया है। उन्होंने बताया कि गृहस्थ जीवन में रहकर भी मनुष्य ईश्वर को प्राप्त कर सकता है, बस हृदय में सच्चा भाव और प्रभु का सत्य नाम होना चाहिए।

झोंकर धाम

उनकी समाधि स्थल की यादगार में झोंकर में वि.सं. 1850 में ओटला और बाद में वि.सं. 1996 (सन 1939) में छत्री बनवाई गई।

गुरुधाम कड़छा (तपोभूमि)

उनकी स्मृति में आज भी पूर्णिमा को भजन-कीर्तन और शरद पूर्णिमा को शरदोत्सव मनाया जाता है।